मोहर्रम क्यो मनाया जाता है ?

मोहर्रम क्यो मनाया जाता है ? 

चर्चित इंडिया न्यूज / बिहार ब्यूरो चीफ विजय कुमार चौधरी / मदीना शरीफ में जब अमीरे मावियाह (अ.स.) की खिलाफत ख़त्म होने वाली थी तो उनके बाद इमाम हुसैन (अ.स.) को खिलाफत मिलनी थी। ऐसा पहले तय हो चुका था, लेकिन अमीरे मावियाह (अ.स.) के दुनिया से जाने के बाद उनका बेटा यज़ीद जो कि बहुत ही बुरा इंसान था उसने अपने आप को खुद खलीफा घोषित कर दिया और लोगों से कहने लगा कि सबको उसी को खलीफा मानना होगा। चूंकि यज़ीद एक निहायती बुरा इंसान था, इस वजह से इमाम हुसैन (अ.स.) जो कि पैगम्बर मुहम्मद सलल्लाहु अलेही के प्यारे नवासे हजरत इमाम हुसैन थे। उन्होंने यज़ीद को खलीफा मानने से इंकार कर दिया।
बता दे कि इमाम हुसैन र.अ कौन थे। अल्लाह (र.अ.) ने अपने कमो बेस 1 लाख 24 हज़ार नबी (अ.स.) ज़मीन पर भेजे, जिनमें आखिरी नबी (स.अ.) हज़रत मोहम्मद मुस्तफा (स.अ.) थे। जो सभी नबियों से ज़्यादा अफज़ल हैं। हज़रत मोहम्मद (स.अ) के दामाद हज़रत अली (अ.स.) और उनकी बेटी जनाबे फातेमा ज़ेहरा (स.अ.) थीं, जिनके 2 बेटे थे। पहले थे इमाम हसन अ.स. जिन्हे जहर देकर मार दिया गया था और दूसरे थे इमाम हुसैन( र.अ)। इमाम हुसैन (र.अ) अपने नाना हज़रत मोहम्मद (स.अ.व.स.) के नेक रास्ते पर चलते थे। इमाम हुसैन (अ.स.) बेसहारा को सहारा देना। किसी पर ज़ुल्म ना करना, सच का साथ देना, हक़ को हक़दार तक पहुंचाना, इंसानियत को बचाना समेत हमेशा हलाल काम की तरफ ही रहते थे।

बता दे कि इमाम हुसैन को लगातार सुचना आने के बाद इमाम हुसैन ने अपने एक भाई हजरत मुस्लिम को कुफा भेजा, लेकिन जिन लोगों ने इमाम हुसैन को सुचना भेजा था वे लोग लालच और यज़ीद के डर की वजह से हजरत मुस्लिम से दूरी बनाने लगे और एक वक्त ये आया कि मुस्लिम के साथ कोई ना रहा और मुस्लिम को यजीद के लश्कर ने शहीद कर दिया। वहीं, इमाम हुसैन अपने साथियों, बीवी, बहनों, बच्चों समेत इराक के लिए निकल गए। इस सफर में उनके साथ उनका 6 महीने का बच्चा अली असगर, 4 साल की बच्ची जनाबे सकीना और 80 साल के बुज़ुर्ग तक मौजूद थे। मोहर्रम महीने की 2 तारीख को इमाम हुसैन (र.अ.) अपने काफिला लेकर करबला नाम की जगह पर पहुंच था।
 करबला पहुंचते ही यज़ीद की फौज ने इमाम हुसैन र.अ. के काफिले को रोक लिया और उस फौज ने इमाम से कहा कि यज़ीद की आप बैत कर लें। इमाम हुसैन अ.स. ने यज़ीद की बैत करने से मना कर दिया। इमाम हुसैन के काफिले को घेर लिया गया था। इसी तरह मोहरम महीने की 7 तारीख हो जाती है और यजीद की फौज इमाम हुसैन को आगे नहीं जाने देती। नहर को भी घेर लेती है जिससे उनका काफिला प्यासा रहे। 7 मोहर्रम से न इमाम हुसैन और उनके काफिले को पानी पीने को मिलता है और न ही कुछ खाने को, 7 मोहर्रम से लेकर 10 मोहर्रम तक तीन दिन तक इमाम हुसैन( र,अ ) का पूरा काफिला भूखा प्यासा रहता था। उनके 6 महीने का बच्चा भी प्यासा तड़पता रहता।

आखिरकार 10 मोहर्रम आती है और यज़ीद की फौज इमाम हुसैन के काफिले पर हमला कर देती है। इमाम हुसैन के सभी साथियों को शहीद कर दिया जाता है और तो और उनके 6 महीने के बच्चे के मुंह मे तीर से वार करके शहीद कर दिया जाता है। इस्लामिक तारीख का ये वो दिन है, जिसको कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। यहांं तक कि जंग के दौरान इमाम हुसैन (अ.स) और उनके साथियों को पानी तक पीने नहीं दिया गया था। जहांं ईमान हुसैन (अ.स) ने अपना खेमा लगाया था वहींं पास से ही एक नदी बहती थी उस पर भी यज़ीदी फौज ने कब्ज़ा कर लिया था। इमाम हुसैन (अ.स ) के घर की औरतों और बच्चों को भी पानी पीने नहीं दिया जा रहा था।  यज़ीदी फ़ौज़ जुल्म की इन्तहा पे पहुंच गए थी

तपते रेगिस्तान में मासूम छाेटे बच्चे इमाम हुसैन (अ.स) के साहब ज़ादे छह महीने के अली असग़र (अ.स ) को भी यज़ीदी लोगों ने हलक़ में तीर मार कर शहीद कर दिया था। मगर इस्लाम के ऐसे मानने वाले इमाम हुसैन (अ.स ) कि उन्होंने यज़ीद जैसे घटिया इंसान को खलीफा मानने से अच्छा शहीद हो जाना समझा और क़यामत तक के लिए ये पैग़ाम दे दिया कि जो भी इस्लाम का सच्चा मानने वाला होगा वो कभी किसी गलत बात को बर्दास्त नहीं करेगा। इस्लामिक तारीख में ये 8,9 और 10 मुहर्रम को हमेशा के लिए अमर हो गये। उनकी वफ़ात के बाद इस्लाम के सच्चे मानने वालों ने बहुत बुरा वक़्त देखा। बहुत ज़ुल्म सहे। लेकिन, जैसे हर एक रात के बाद दिन निकलता है, ठीक वैसे ही इमाम हुसैन (अ.स ) की शहादत के बाद एक बार फिर से इस्लाम ज़िंदा हुआ और पूरी दुनिया में क़यामत तक के लिए फैल गया। उनकी क़ुर्बानी को मुहर्रम में याद किया जाता है।

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