मिथिला पीठाधीश्वर जगदगुरु मुरारी शरणाचार्य जी का निधन
मिथिला पीठाधीश्वर जगदगुरु मुरारी शरणाचार्य जी का निधन
चर्चित इंडिया न्यूज़ / विजय कुमार चौधरी /बखरी अनुमंडल के परिहारा, बेगूसराय (बिहार) के निवासी, मिथिला पीठाधीश्वर एवं जगद्गुरु श्री मुरारी शरणाचार्य जी का निधन 25 जनवरी 2026 की रात्रि में हो गया। उनके ब्रह्मलीन होने से सम्पूर्ण मिथिला क्षेत्र तथा देशभर के संत-समाज और श्रद्धालुओं में शोक की लहर व्याप्त है।
जगद्गुरु मुरारी शरणाचार्य जी को सामाजिक समरसता के प्रतीक के रूप में व्यापक सम्मान प्राप्त था। उन्हें रामानुजाचार्य संप्रदाय के जगद्गुरु की उपाधि प्रतीवादिभयंकर पीठ, कांचीपुरम के पूज्य श्रीनिवासाचार्य स्वामी जी तथा भारतीय जगद्गुरुवों द्वारा वर्ष 2013 के प्रयाग महाकुंभ अन्तरराष्ट्रीय वैष्णव सम्मेंलन में प्रदान की गई थी। यह सम्मान उनके अद्वितीय आध्यात्मिक योगदान और धर्मसेवा की स्वीकृति था।
वे भक्ति, ज्ञान, दर्शन एवं ज्योतिष के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर के महान विद्वान थे। संपूर्ण मिथिला भूमि में भक्ति मार्ग पर आधारित रामानुज संप्रदाय के वे प्रथम जगद्गुरु हुए । उन्होंने इस परंपरा के प्रचार-प्रसार और वैष्णव भक्ति जागरण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
जगद्गुरु आश्रम, परिहारा के संस्थापक थे । तथा मिथिला में आयोजित श्रीवैष्णव सम्मेलनों के महामंत्री के रूप में 72 वर्ष सक्रिय रहे। वे संस्कृत व्याकरण और साहित्य , ज्योतिष के प्रकाण्ड विद्वान थे और उन्हें सम्पूर्ण भारत के अनेक धर्माचार्यों द्वारा समय-समय पर सम्मानित किया गया।
उनकी प्रमुख रचनाओं में “भवबंध विमुक्ति”, “मुरारि स्तव” तथा “प्रातःकृत्य विधि” जैसे ग्रंथ शामिल हैं। ये पुस्तकें धर्ममार्ग पर चलने वाले तथा रामानुज संप्रदाय के वैष्णवों के लिए अत्यंत मार्गदर्शक मानी जाती हैं — अनेक श्रद्धालु इन्हें अपने आध्यात्मिक जीवन की “गीता” के समान मानते हैं। मिथिला क्षेत्र में धर्म से संबंधित किसी भी शंका या जिज्ञासा का समाधान प्रायः उनके मार्गदर्शन से ही किया जाता था।
पिछले लगभग 50 वर्षों से वे सिमरिया धाम में रामानुज संप्रदाय के प्रचार हेतु नियमित रूप से व्रत-अनुष्ठान एवं सेवा कार्य करवाते थे, जहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की सेवा की जाती थी। उनका जीवन पूर्णतः भक्ति, सेवा, विद्वत्ता और समाज को जोड़ने की भावना को समर्पित रहा।
अतः प्रार्थना है कि दिवंगत दिव्यात्मा के पारलौकिक गमन के बाद की क्रिया 4 - 5फरवरी श्राद्ध तथा 6-7 को बैकुंठोत्सव में सम्मिलित होकर अनुयायियों और श्रद्धालुओं को इस अपार दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करें।
ॐ शांति।
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