निगाहें टिकी देश की 5 चुनावी राज्यों पर
निगाहें टिकी देश की 5 चुनावी राज्यों पर
चर्चित इंडिया न्यूज़ : विजय प्रकाश : देश के पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम से राज्यों के साथ-साथ देश की राजनीति अगले एक माह में नया मोड़ लेने वाली है. पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि भाजपा के लिए भविष्य का रोडमैप तय करने वाले हैं. कहीं महज 5% वोट का स्विंग सरकार बना सकता है, तो कहीं एकजुट वोट बैंक पूरी बाज़ी पलट सकता है. पश्चिम बंगाल में टीएमसी सुप्रीमों ममता बनर्जी के वोट बैंक खिसके तो सत्ता बदल सकती है, जबकि असम में मुस्लिम वोटों की एकजुटता भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है. ऐसे में सवाल यही है- क्या भाजपा इन चुनावों में अपना दबदबा और बढ़ाएगी या कुछ राज्यों में उसे बड़ा झटका लगेगा?
पश्चिम बंगाल में मुकाबला सीधे ममता बनर्जी की टीएमसी और भाजपा के बीच सिमटता दिख रहा है. 2015 में जब कैलाश विजयवर्गीय को बंगाल की जिम्मेदारी दी गई थी, तब पार्टी की मौजूदगी बेहद सीमित थी. लेकिन 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 18 सीटें जीतकर बड़ा उछाल दिखाया और 2021 विधानसभा चुनाव में 77 सीटों के साथ मजबूत विपक्ष बनकर उभरी. अब 2026 के चुनाव में भाजपा सरकार के सबसे करीब मानी जा रही है. आंकड़े बताते हैं कि अगर भाजपा टीएमसी के सिर्फ 5% वोट भी खींच लेती है, तो 10% के मार्जिन से हारी सीटों पर जीत हासिल कर सकती है. इससे उसकी सीटें 150 के पार जा सकती हैं. एंटी-इनकम्बेंसी, बेरोजगारी और स्थानीय असंतोष भाजपा के लिए बड़ा मौका बन सकते हैं।
मैट्रीज सर्वे के मुताबिक इस बार बंगाल में मुकाबला बेहद कांटे का है और जीत-हार का अंतर बहुत मामूली रह सकता है. राज्य की कुल 294 सीटों में बहुमत का आंकड़ा 148 है, और इसी आंकड़े के आसपास दोनों बड़ी पार्टियां सिमटती नजर आ रही हैं. भाजपा और टीएमसी के बीच सिर्फ 2% वोट शेयर का अंतर दिख रहा है, जो बताता है कि चुनाव पूरी तरह 'नेक टू नेक' है. यही वजह है कि इस बार नतीजे आखिरी वक्त तक रोमांच बनाए रख सकते हैं. ओपिनियन पोल के मुताबिक भाजपा को 130 से 150 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि टीएमसी को 140 से 160 के बीच सीटें मिल सकती हैं. वहीं अन्य पार्टियों के खाते में 8 से 16 सीटें जाने का अनुमान है. भाजपा और टीएमसी दोनों पार्टियां बहुमत के बेहद करीब हैं. ऐसे में छोटे दलों की भूमिका 'किंगमेकर' बन सकती है. वोट शेयर की बात करें तो टीएमसी को 43%, भाजपा+ को 41% और अन्य को 16% वोट मिलने का अनुमान है. यह अंतर बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन सीटों के समीकरण पर इसका असर पड़ सकता है. मार्च में आए आईएएनएस और मैट्रीज ओपिनियन पोल में टीएमसी को 155-170 सीटें मिलने का अनुमान था, जबकि एनडीए को 100-115 सीटें दी गई थीं. अब ताजा आंकड़ों में टीएमसी की सीटें घटती दिख रही हैं, जबकि भाजपा की सीटों में बड़ा उछाल नजर आ रहा है. इसका मतलब साफ है कि चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, मुकाबला और भी कड़ा होता जा रहा है।
असम में भाजपा की स्थिति मजबूत जरूर है, लेकिन यहां का समीकरण बेहद संवेदनशील है. हिमंता बिस्व सरमा के नेतृत्व में पार्टी तीसरी बार सत्ता में वापसी के लिए संघर्ष कर रही है. 2016 में भाजपा ने पहली बार राज्य में सरकार बनाई और 2021 में दोबारा जीत दर्ज की. लेकिन 2026 में सबसे बड़ा फैक्टर है राज्य की 34% मुस्लिम आबादी. अगर ये वोट कांग्रेस और एआईयूडीएफ के बीच बंटता है, तो भाजपा को फायदा होगा. लेकिन अगर मुस्लिम वोट एकजुट हो गया, तो मुकाबला बेहद कठिन हो सकता है। भाजपा यहां बांग्लादेशी घुसपैठ और पहचान की राजनीति को मुद्दा बनाकर हिंदू वोटों को साधने की रणनीति पर काम कर रही है।
असम में चुनाव एक चरण में 9 अप्रैल को होगा। इसके बाद 4 मई को नतीजे आ जाएंगे. उससे पहले मैट्रीज का ओपिनियन पोल सामने आ है. असम में 126 विधानसभा सीटें हैं. इस चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए को 92 से 102 सीटें मिल सकती हैं. एनडीए में भाजपा, असम गण परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट शामिल है. वहीं कांग्रेस और उसके सहयोगी पार्टियों की बात करें तो पोल के मुताबिक उन्हें इस बार सिर्फ 22-32 सीटें मिल सकती हैं. कांग्रेस ने असम जातीय परिषद, रायजोर दल, माकपा, ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस और भाकपा (माले) लिबरेशन के साथ गठबंधन किया है, और इस गुट को 'असम सोनमिलितो मोर्चा' कहा जाता है. मैट्रिज़ के अनुसार अन्य दल भी चार से सात सीटें जीत सकते हैं ।
तमिलनाडु में भाजपा के लिए चुनौती अलग तरह की है. यहां दशकों से डीएमके और एआईएडीएमके का वर्चस्व रहा है. भाजपा को "बाहरी पार्टी" की छवि से बाहर निकलना सबसे बड़ा टास्क है. पूर्व आईपीएस अधिकारी के अन्नामलाई के नेतृत्व में पार्टी ने आक्रामक रणनीति अपनाई है. उनकी 'एन मन, एन मक्कल' यात्रा ने भाजपा को गांव-गांव तक पहुंचाया. 2024 लोकसभा चुनाव में सीट नहीं जीत पाने के बावजूद भाजपा का वोट शेयर 11.2% तक पहुंच गया, जो पहले 2.6% था. अब इस साल 2026 में एआईएडीएमके के साथ गठबंधन कर भाजपा खुद को एक मजबूत विकल्प के तौर पर स्थापित करना चाहती है।
तमिलनाडु में 23 अप्रैल को विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग होगी, उससे पहले एक प्री-पोल सर्वे में सत्ताधारी डीएमके गठबंधन के आगामी चुनाव में जीतने का अनुमान लगाया है. 'लोक पोल' एजेंसी के सर्वे में अनुमान लगाया गया है कि मुख्यमंत्री एम के स्टालिन के नेतृत्व वाला गठबंधन 234 सीटों में से 181-189 सीटें हासिल कर सकता है. साथ ही इस गठबंधन ने 40.1 प्रतिशत शेयर मिलने की उम्मीद है. एक मार्च से एक अप्रैल के बीच किए गए सर्वे के अनुसार, विपक्षी एआईएडीएमके के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन को 38 से 42 सीटें मिलने का अनुमान है, जिसमें उसे 29% वोट शेयर मिल सकता है. अभिनेता से राजनेता बने विजय की पार्टी 'तमिलगा वेट्री कझगम' (टीवीके), जो पहली बार चुनाव मैदान में है, उसे 23.9 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 8-10 सीटें मिलने का अनुमान है. एनटीके और अन्य दूसरी पार्टियों को 4.9 प्रतिशत और 2.1 फीसद वोट शेयर मिलने का अनुमान है. सर्वे के मुताबिक, मुख्यमंत्री पद के लिए एम के स्टालिन सबसे पसंदीदा चेहरा हैं, उनके बाद विजय और एआईएडीएमके के एडप्पादी के पलानीस्वामी का नंबर आता है।
'लोक पोल' के सर्वे में डीएमके गंठबंधन साफ तौर पर बढ़ता बनाए हुए हैं. जिसकी मुख्य वजह उसकी जन कल्याणकारी योजनाएं जैस- कलाईनार मगलीर उरिमाई थोगई, महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा और नाश्ता योजना शामिल हैं. इस योजनाओं ने खासकर ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्रों की महिलाओं के साथ गहरा जुड़ाव बनाया है, जिससे डीएमके को मजबूती मिलती है. सर्वे में यह भी सामने आया है कि डीएमके के लिए सबसे बड़ा फायदा यह है कि विपक्षी दलों के वोट एनडीए और टीवीके के बीच बंट रहे हैं. 1,17,000 लोगों पर किए गए इस सर्वे में बताया गया है कि विजय की पार्टी को अच्छा खासा वोट मिल रहा है, खासकर युवा वोटरों का जो पहली बार वोट डालने वाले हैं और सरकार से नाखुश है. हालांकि, सर्वे में यह भी बताया गया कि यह समर्थन शायद ज्यादा सीटों में तब्दील न हो पाए, क्योंकि विजय की पार्टी अकेले चुनाव लड़ रही है. वहीं पलानीस्वामी की पार्टी अंदरूनी कलह से जूझ रही है. पार्टी में फूट, अहम नेताओं का साथ छोड़ना और कार्यकर्ताओं का मनोबल कम होना पार्टी के प्रदर्शन पर असर डाल रहा है।
'पोल ट्रैकर' के एक सर्वे में यह भी अनुमान लगाया है कि डीएमके के नेतृत्व वाला गठबंधन भारी बहुमत के साथ सत्ता में बना रहेगा. सर्वे के मुताबिक, सत्ताधारी गठबंधन को 172 से 178 सीटें मिल सकती हैं. साथ ही उसे 42.7 प्रतिशत वोट शेयर मिलने की उम्मीद है. वहीं, एआईएडीएमके के काफी पीछे रहने का अनुमान है, जिसे 46 से 52 सीटें मिल सकती हैं. टीवीके को 19.2 प्रतिशत वोट शेयर मिलने का अनुमान है, जिससे उसे 6 से 12 सीटें मिल सकती हैं. नीटके को 5.1 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 0 से 2 सीटें मिलने की उम्मीद है. सर्वे के विश्लेषण से पता चला है कि एआईएडीएमके और भाजपा के गठबंधन की वजह से, एआईएडीएमके के नेतृत्व वाले मोर्चे के खिलाफ अल्पसंख्यक वोटों का ध्रुवीकरण हुआ है. इसमें यह भी बताया गया है कि मुदलियार, नायडू और मुस्लिम समुदायों सहित कई समुदाय, मोटे तौर पर डीएमके गठबंधन की तरफ झुके हुए हैं. 'पोल ट्रैकर' के सर्वे में कहा गया है कि आम लोगों की नजर में, मतदाताओं का एक तबका एम के स्टालिन को एडप्पादी के पलानीस्वामी और विजय के मुकाबले ज्यादा जाना-पहचाना और स्थापित नेता मानता है।
केरल लंबे समय से भाजपा के लिए सबसे कठिन राज्यों में रहा है. यहां सत्ता हमेशा एलडीएफ और यूडीएफ के बीच घूमती रही है. 2016 में भाजपा ने पहली बार एक सीट जीती, लेकिन 2021 में फिर शून्य पर आ गई. हालांकि 2024 लोकसभा चुनाव में सुरेश गोपी की जीत ने पार्टी को नई उम्मीद दी. इसके अलावा निकाय चुनावों में तिरुवनंतपुरम नगर निगम में जीत ने भाजपा को मजबूती दी है. लेकिन यहां 45 फ़ीसदी मुस्लिम और ईसाई आबादी पार्टी के लिए चुनौती बनी हुई है. भाजपा इस बार ईसाई समुदाय को साधने की कोशिश कर रही है और स्थानीय दलों के साथ गठबंधन की है. लक्ष्य साफ है- सीधे सत्ता नहीं, बल्कि 'किंगमेकर' बनना ।
पिछले एक दशक से सत्ता पर काबिज एलडीएफ और वापसी की आस लगाए यूडीएफ के बीच कांटे की टक्कर दिख रही है. 2.7 करोड़ मतदाताओं वाले केरल में क्या इस बार सत्ता परिवर्तन होगा या पिनाराई विजयन का जादू बरकरार रहेगा?. आंकड़ों की मानें तो कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ को 67 से 73 सीटें मिलने का अनुमान है, जो बहुमत के बेहद करीब है. वहीं, सत्ताधारी एलडीएफ को 62 से 68 सीटों पर संतोष करना पड़ सकता है. वोट प्रतिशत के मामले में भी यूडीएफ 42% के साथ सबसे आगे दिख रहा है, जबकि एलडीएफ 39% पर सिमटता नजर आ रहा है. यह 3% का फासला केरल की राजनीति में बड़ा उलटफेर करने के लिए काफी है. भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को भी इस बार 15% वोट शेयर के साथ 5 से 8 सीटें मिलने की उम्मीद है, जो मुख्य मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकता है. केरल विधानसभा का कार्यकाल 23 मई को खत्म हो रहा है और इस बार मुकाबला सीधे तौर पर अस्तित्व की लड़ाई बन गया है. राज्य के करीब 1.38 करोड़ महिला मतदाता और 1.31 करोड़ पुरुष मतदाता 9 अप्रैल को अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे. फिलहाल, केरल की गलियों में चुनावी बिगुल फुंक चुका है और जनता अपने अगले मुख्यमंत्री का चुनाव करने के लिए तैयार है।
पुडुचेरी में भाजपा ने गठबंधन राजनीति के जरिए अपनी पकड़ मजबूत की है. एन. रंगास्वामी की पार्टी एआईएनआरसी के साथ मिलकर 2021 में सरकार बनाई गई थी. भाजपा ने 9 में से 6 सीटें जीतकर चौंकाया था. साथ ही नॉमिनेटेड विधायकों के जरिए अपनी ताकत और बढ़ा ली. अब इस साल 2026 में भाजपा की कोशिश सत्ता बरकरार रखने के साथ-साथ अपनी सीटें बढ़ाने की है. पार्टी दक्षिण भारत में यह संदेश देना चाहती है कि वह क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर स्थिर सरकार चला सकती है।
बहरहाल, अगर पांचों राज्यों का कुल मिलाकर विश्लेषण करें तो भाजपा बंगाल और असम में सबसे मजबूत स्थिति में दिख रही है, लेकिन दोनों जगह अलग-अलग चुनौतियां हैं. तमिलनाडु और केरल में पार्टी विस्तार की रणनीति पर काम कर रही है, जबकि पुडुचेरी में सत्ता बचाना प्राथमिकता है. आने वाले अगले माह तय हो जाएगा कि भाजपा इन राज्यों में अपनी पकड़ और मजबूत करती है या फिर कुछ जगहों पर उसे झटका लगता है। चुनावी गणित साफ है कि कहीं 2 से 5 फ़ीसदी वोट से सरकार बन सकती है, तो कहीं एकजुट वोट बैंक पूरी तस्वीर बदल सकता है।
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