गुरु ,शिष्य और भक्ति योग : लेखक डॉ आर के यादव प्रार्थना समिति हसनपुर, समस्तीपुर (बिहार)
गुरु ,शिष्य और भक्ति योग : लेखक:-
डॉ आर के यादव
प्रार्थना समिति हसनपुर, समस्तीपुर (बिहार)
चर्चित इंडिया न्यूज़ / विजय कुमार चौधरी ( समस्तीपुर) कर्म योग, भक्ति योग, राज योग और ज्ञान योग आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का चार जातिय मार्ग हैं।तरिके अलग हैं परन्तु उद्देश्य एक हीं ईश्वर से मिलना है। इनमें ज्ञान योग ,सर्वोच्च किन्तु कठिनतम है।इसको बुद्धि के द्वारा तो बहुत से लोग ग्रहण कर लेते हैं लेकिन उसकी सिद्धि बहुत कम लोग कर पाते हैं। भक्ति योग अथवा पूजा ,किसी भी रूप में प्रेम मनुष्य के लिए सबसे सरल, सुखद ,स्वाभाविक और सहज मार्ग है। मानव मात्र के हृदय में व्यष्टि रुप से प्रेम मिलन की नैसर्गिक प्रेरणा है। यही वह भू-तल है जिस पर कोई भी सिद्ध सद् गुरु अपने ब्रह्म व्यक्त समष्टि प्रेम का करुणामय स्पर्श और सम्पन्न दृष्टि से शिष्यों में भक्ति का सुत्रपात कर देते हैं। ज्ञान योगी के लिए साधना का मार्ग आंधी में भी दीप जलाए रखने जैसा कठिन कार्य होता है जहां दीप बुझने का डर हमेशा बना रहता है। अपने ज्ञान से ईश्वर का अंगुली पकड़कर चलते समय पगडंडियों पर फिसलता भी रहता है। भक्ति योग मार्ग में साधक अपने पूर्ण समर्पण के साथ बालपन बोध से युक्त ईश्वर के गोद में बैठा परम् सुख का आनंद लेते रहता है।जिसके जीवन में सोते उठते बैठते,हर सुख दुःख उस ईश्वर का प्रसाद बन जाता है।
युवा नरेंद्र अपने ज्ञान से इश्वरीय सत्य की खोज में लगा हुआ था। सनातन धर्म के ज्ञान का प्रतीक वेदों , उपनिषदों और सभी धर्म शास्त्रों को स्थापित करने में व्याकुल था,जो विदेशी मिशनरियों के द्वारा धुमिल किया जा रहा था।भारतीय सनातन धर्मियों का धर्मान्तरण हो रहा था।अपने संस्कृति और धर्म कि रक्षा जिसके जीवन का चरित्र बन गया,भला वह कैसे बैठा रह सकता था। एक दिन किसी खास मौके पर श्री राम कृष्ण परमहंस जी महाराज का दृष्टि उस युवक नरेंद्र पर चला जाता है। महाराज जी उस युवक के भीतर कि तूफान को भांपते हुए,उसे कलकत्ता दक्षिणेश्वरी मां काली के मन्दिर पर मिलने का निमंत्रण दे दिए। साधारण सा दिखने वाले महाराज जी के बारे में काफी तर्क़ वितर्क के बाद वह युवक उनसे मिलने भी पहुंच जाता है। मिलते हीं वह युवक श्री रामकृष्ण परमहंस जी के पास तुरंत अपनी जिज्ञासा रखते हुए प्रश्न करता है कि आपने ईश्वर को देखा है। उन्होंने उस युवक कि जिज्ञासा शांत करते हुए कहा हां, हम ईश्वर को देखते भी हैं और बात भी करते हैं, बिल्कुल वैसे जैसे तुम मुझसे बात करते हो।उस युवक ने कहा क्या आप मुझे उसे दिखा सकते हैं।श्री रामकृष्ण परमहंस ने कहा हां अभी और इसी वक्त। इतना कहकर वो उस युवक को स्पर्श करते है। स्पर्श होते हीं वह युवक नरेंद्र अचेत हो जाता है। अचेतावस्था से वापस आते हीं नरेंद्र श्री रामकृष्ण परमहंस जी के चरणों में गिर जाता है,तब तक उसे ईश्वर कि अनुभूति हो चुका था। उसके अपने ज्ञान का लोप भी हो जाता है और मन ,बुद्धि से परे एक आलौकिक जगत से साक्षात्कार हो जाता है।वह युवक नरेंद्र उनसे शिष्वत्व ग्रहण करता है और दुनिया के सामने सनातन धर्म संस्कृति का ध्वज पताका फहराकर युवक नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद के रूप में विख्यात हो जाता है।ऐसी घटनाएं तो सुनी , पर देखी नहीं। सौभाग्य से शायद किसी जन्मों का हमारा कोई शुभ संस्कार रहा होगा। एक दिन ऐसे हीं एक महान संत प्रातः स्मरणीय परमाराध्य अनंत श्री विभूषित बाबा बलराम सिंह जी महाराज का दर्शन प्राप्त हुआ। उनके स्पर्श का अनुभूति आज भी संजोए रखने का अभ्यास कर रहा हूं। उनके द्वारा मांगी गई गुरु दक्षिणा के रूप में समर्पण, अनुशासन और दृढ़ विश्वास को मजबूती से खड़ा रखने का नित्य अभ्यास भी कर रहा हूं।वो ब्रह्मलीन होते हुए भी कभी-कभी महसूस करा हीं जातें हैं। मुझे विश्वास है, जिस जगत जननी मां काली से उन्होंने हम सबों का हाथ पकड़वाये,कभी मां का गोद भी उनकी कृपा से अवश्य प्राप्त होगा। मातृ उदवोधन आश्रम, यारपुर पटना (बिहार) परम् पूज्य श्री गुरुदेव जी महाराज द्वारा स्थापित उस शक्ति स्थल तीर्थ के रूप में विख्यात है जिस भुमि पर आज भी समर्पण, अनुशासन और विश्वास कि गूंज सुनाई पड़ती है। सच्ची समर्पण और विश्वास जहां है उसे हीं महसूस होता है।ऐसी अनुभूति उसे हीं प्राप्त होता है जो गुरु देव के प्रति भक्ति भाव योग सम्पन्न होता है। यथा,गुरु अनादि,अनंत, अविनाशी सार्वभौम स्वयं सिद्ध सत्ता हैं। गुरु का अवतरण होता है जन्म नहीं।गुरु वह मुक्त आत्मा है जो कण कण में दिव्य ज्योति के रूप में व्याप्त है,। कोई भी काल,स्थान और परिस्थिति गुरु कि सत्ता से मुक्त नहीं रहता। जिस तरह सूर्य के उदय होते अंधकार गायब हो जाता है, ठीक उसी तरह अध्यात्मिक गुरु के उदय होते हीं शिष्यों का जीवन धन्य हो जाता है। उसके अध्यात्मिक जीवन का यात्रा शुरू होकर अंत में पावन और पूर्ण हो जाता है। शिष्यों में ऐसी शक्ति को सम्प्रेषित करने कि कला केवल सद् गुरु के पास हीं होता है, परम् पूज्य श्री गुरुदेव बाबा बलराम सिंह जी महाराज इसके साक्षात प्रतिमान थे।किसी भी अच्छी फसल के लिए उन्नत बीज और उपजाऊ जमीन दोनो कि जरूरत है। गुरु वहीं हैं जो अपनी उन्नत अध्यात्मिक शक्ति को शिष्यों में सम्प्रेषित करता हो और शिष्य भी वही है जो उस शक्ति को ग्रहण करने योग्य हो। भगवत गीता का वक्ता श्री कृष्ण और श्रोता अर्जुन, जब दोनों सुयोग मिलता है तब धर्म कि जय और अधर्म का नाश हो जाता है।आप शिष्य बनना सीखें ,गुरु अनंत रुपों में सर्वत्र तुझे सर्वोच्च अध्यात्मिक शिखर तक पहुंचाने के लिए तैयार हैं, क्योंकि वो परम् दयालु भी जो हैं। ।इसके लिए महाभारत के अर्जुन कि तरह अनुरागी बनना होगा।श्री कृष्ण से सुदामा,राधा,उद्धव जी,मीराबाई,सुरदास और कवि रसखान का प्रेम, ,जिस प्रेम में संसार कि किसी वस्तु कि कोई याचना नहीं,केवल प्रेम के लिए प्रेम होता दिखता है अर्थात पूर्ण समर्पण। संसार का कोई भी सापेक्ष धन- सम्पदा,सुख- दुःख, शुभ-अशुभ के विचारों से मुक्त हुए बिना सद् गुरु के दर्शन का लाभ नहीं मिल सकता है।जिसे गुरु देव कि कृपा प्राप्त हो जाय उसे फिर चाहिए हीं क्या।
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डॉ आर के यादव
प्रार्थना समिति हसनपुर, समस्तीपुर (बिहार)
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